ANKAHI SHAYARI(अनकही शायरी)
जाना भी ज़रूरी और डर भी बहुत।
क़ैद करे ख़ुद को या आगे बड. जाये।
कफ़स ए परिंदा फड़फड़ाता बहुत!
@ दीपक बंसल
2.समझे मुझे तो खुली किताब हूँ मैं!
अपनों के सामने बेनक़ाब हूँ मैं!
क्या रखा इस मंजर में,
अपनों के कर्मों से आघात हूँ मैं!!
@दीपक बंसल
अपनों के सामने बेनक़ाब हूँ मैं!
क्या रखा इस मंजर में,
अपनों के कर्मों से आघात हूँ मैं!!
@दीपक बंसल
3.ख़ुद से ख़ुद को जुदा माना मैंने!
तकलीफ़ से ख़ुद का पैमाना माना मैंने!
लिखते ही ताक़त आ जाती ज़ुबा दिल मैं,
क्या कहुँ कब दिल को दिमाग़ से जुदा माना मैंने!!
@दीपक बंसल
तकलीफ़ से ख़ुद का पैमाना माना मैंने!
लिखते ही ताक़त आ जाती ज़ुबा दिल मैं,
क्या कहुँ कब दिल को दिमाग़ से जुदा माना मैंने!!
@दीपक बंसल
4.रुतबा ए इश्क़ मोहब्बत ए आरजू!
तकलीफ़ तो खुदाया ख़ुद से थी!!
दरख़्त सी ज़िंदगी है अपनी!
सीने में जान तो है पर सुनाने को लफ्ज़ नहीं!!
@दीपक बंसल
तकलीफ़ तो खुदाया ख़ुद से थी!!
दरख़्त सी ज़िंदगी है अपनी!
सीने में जान तो है पर सुनाने को लफ्ज़ नहीं!!
@दीपक बंसल
5.लोगो ने बनायी दूरिया मुझसे और इल्ज़ाम भी मुझ पर है ।
कहते दुश्मन जमाने को ,यहा तो अपना ही बेगाना है!
@दीपक बंसल
कहते दुश्मन जमाने को ,यहा तो अपना ही बेगाना है!
@दीपक बंसल
7.कभी चोट दिल पर लगी तो अफ़सोस मुझे भी था!
कम्बक्त आरजू तड़प उठी जब संभाला उसने भी था!
कह रहे थे लोग मत जा उस गली ,
पर क्या करे एक बार तड़प कर पुकारा उसने भी था!
@दीपक बंसल
कम्बक्त आरजू तड़प उठी जब संभाला उसने भी था!
कह रहे थे लोग मत जा उस गली ,
पर क्या करे एक बार तड़प कर पुकारा उसने भी था!
@दीपक बंसल
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