Tuesday, 30 June 2026

ANKAHI SHAYARI(अनकही शायरी)

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

ANKAHI SHAYARI(अनकही शायरी)


1.एक तरफ़ा रास्ता और दुँधला सा गलियारा!
जाना भी ज़रूरी और डर भी बहुत।
क़ैद करे ख़ुद को या आगे बड. जाये।
कफ़स ए परिंदा फड़फड़ाता बहुत!
@ दीपक बंसल


2.समझे मुझे तो खुली किताब हूँ मैं!
अपनों के सामने बेनक़ाब हूँ मैं!
क्या रखा इस मंजर में,
अपनों के कर्मों से आघात हूँ मैं!!
@दीपक बंसल


3.ख़ुद से ख़ुद को जुदा माना मैंने!
तकलीफ़ से ख़ुद का पैमाना माना मैंने!
लिखते ही ताक़त आ जाती ज़ुबा दिल मैं,
क्या कहुँ कब दिल को दिमाग़ से जुदा माना मैंने!!
@दीपक बंसल


4.रुतबा ए इश्क़ मोहब्बत ए आरजू!
तकलीफ़ तो खुदाया ख़ुद से थी!!
दरख़्त सी ज़िंदगी है अपनी!
सीने में जान तो है पर सुनाने को लफ्ज़ नहीं!!
@दीपक बंसल


5.लोगो ने बनायी दूरिया मुझसे और इल्ज़ाम भी मुझ पर है ।
कहते दुश्मन जमाने को ,यहा तो अपना ही बेगाना है!
@दीपक बंसल


6.ना लिखी शायरी मैंने ना लिखी किताब!
बंद कमरो में घोट दिया ख़ुद को ,फिर भी हम आबाद!!
@दीपक बंसल


7.कभी चोट दिल पर लगी तो अफ़सोस मुझे भी था!
कम्बक्त आरजू तड़प उठी जब संभाला उसने भी था!
कह रहे थे लोग मत जा उस गली ,
पर क्या करे एक बार तड़प कर पुकारा उसने भी था!
@दीपक बंसल



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